चाय और इडली

गर्मियों की छुट्टियां बिताने मैं अक्सर नानी के घर चली जाती थी.नानी का घर पौढ़ी गढ़वाल के एक छोटे से गांव में था. वहां जाने के लिए दिल्ली से ३ बस बदलनी पढ़ती थी.

ये सन २००१ की बात है. दिल्ली से जब उत्तरकाशी पहुंची तो बहुत ज़ोरों की भूख लग चुकी थी. परन्तु मैंने सोचा कि गांव पहुँच के नानी के हाथ का भोजन करेंगे, तब तक भूख पे संयम कर लेते हैं.

गांव पहुँचने के लिए बस एक झरना पार करके जाती थी, जो साधक पर से हो कर बहता था. उस दिन झरने का प्रभाव ज़्यादा था तो बस वहीँ पर रुक गई. आगे का सफर, करीबन १० किलोमीटर का, पैदल ही तय करना था. आधा रास्ता चल के पैरों नो जवाब दे दिया. भूख के मारे सिर चकरा रहा था. तभी एक छोटी सी चाय कि दूकान दिखी और मेरी जान में जान आई.

चाय के ३ कप पी लिए तो दूकान वाले भैया ने पुछा "लगता है बहुत भूख लगी है तुमको?"

चाय पीते पीते ही मैं बोली "हाँ जी , सुबह से कुछ नहीं खाया, अब तो चला भी नहीं जा रहा. कुछ खाने को है आपके पास?"

२ मिनट विचार करके वह बोले "इडलियां हैं. खाओगी?"

मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, मैंने बोलै आप बस लाते जाओ, सारी खा लुंगी. भरपेट इडलियां खाने के बाद, वह बोले कि इडलियां अब ख़त्म. उनका शुक्रिया अदा करते हुए मैंने पुछा कितने पैसे हुए?

"9 रुपये" आश्चर्यचकित हो कर मैंने पुछा "सिर्फ 9 रुपए?"

मैंने उनकी दुकान की ओर ध्यान से देखा, वह दुकान तो सिर्फ चाये की थी. जो इडलियां मैंने ख़त्म कर दीं, वह तो उनके परिवार के खाने हेतु थीं. उन्होंने अपने परिवार के लिए बनाया हुआ सारा भोजन मुझे खिला दिया, ओर मैं इस बात से अज्ञात खाती रही.

शर्मिंदगी महसूस करते हुए मैंने उनको १०० रपये दिए कर वह मुझे 91 रुपये लौटाने लगे तो मैंने स्पष्ट मना कर दिया. बहुत देर तक पैसे रखने को मना करते रहे परन्तु मैं भी नहीं मानी ओर आखिर में उनको पूरे १०० रुपये थमा कर ही वहां से निकली.

गांव की ओर चलते चलते इस पूरी व्याख्या से एक बात मुझे समझ में आई.-

यदि किसी की सहायता करने के लिए अपना पेट काट कर नहीं दिया, तो क्या दिया.

- Noor

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