भेड़ियों के ढंग

देखिये कैसे बदलती आज दुनिया रंग
आदमी की शकल, सूरत, आचरण में भेड़ियों के ढंग

द्रौपदी फिर लुट रही है दिन दहाड़े
मौन पांडव देखते हैं आँख फाड़े
हो गया है सत्य अँधा, न्याय बहरा, और धर्म अपंग

नीव पर ही तो शिखर का रथ चलेगा
जड़ नहीं तो पेड़ भला कैसे फैलेगा
देखना आकाश में कब तक उड़ेगी दोरहीन पतंग

डगमगाती नाव में पानी भरा है
सिरफिरा तूफ़ान भी ज़िद पे ाढ़ा है

शब्द की गंगा दुहाई दे रही है
युग दशा भी पुनः करवट ले रही है
स्वाभिमानी लेखनी का शील कोई कर न पाए भंग

- Udaybhanu Hans

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